“नारी सम्मान या नैरेटिव गेम? भाजपा-कांग्रेस दोनों की सियासत बेनकाब”

जयपुर, 23 अप्रैल 2026(न्याय स्तंभ)। महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाले नारी शक्ति वंदन बिल को लेकर देश में सियासी सरगर्मी तेज है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी और उसके आनुषंगिक संगठन—युवा मोर्चा व महिला मोर्चा—सड़कों पर उतरकर “बिल गिराए जाने” के विरोध में प्रदर्शन और पुतला दहन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर सरकार की मंशा और कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रही है।

तथ्य यह है कि यह बिल सितंबर 2023 में संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुका है। इसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रावधान है, लेकिन इसके लागू होने को जनगणना और परिसीमन से जोड़ा गया है, जिसके कारण अभी तक यह जमीन पर लागू नहीं हो सका है।

यहीं से उठता है सबसे बड़ा सवाल—
जब बिल पास हो चुका है, तो “गिराए जाने” के विरोध का आधार क्या है?राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि देश की सबसे बड़ी पार्टी, जिसके पास अनुभवी नेतृत्व, मजबूत संगठन और बड़ा “थिंक टैंक” माना जाता है—वह यदि एक पास हो चुके बिल को लेकर “गिराए जाने” का नैरेटिव बनाकर सड़कों पर उतरती है, तो यह स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है।

क्या यह जानकारी का अभाव है, या फिर जानबूझकर बनाया गया सियासी मुद्दा?
क्या इतने बड़े स्तर के रणनीतिकारों और नीति निर्धारकों के रहते हुए भी जमीनी स्तर पर ऐसा विरोध हो रहा है, या फिर यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है?

कांग्रेस इस पूरे मुद्दे पर भाजपा को घेरते हुए कह रही है कि बिल को पास कराने के बाद भी लागू नहीं किया गया, जिससे यह सिर्फ राजनीतिक घोषणा बनकर रह गया है।
जमीनी हकीकत ये है कि  बिल संसद से पारित हो चुका है लेकिन अभी तक लागू नहीं हुआ है। लेकिन इसको लेकर सियासत चरम पर है।

जयपुर सहित कई जगहों पर हो रहे इन प्रदर्शनों ने यह बहस तेज कर दी है कि
क्या यह वास्तव में महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई है, या फिर एक ऐसा मुद्दा, जिस पर दोनों प्रमुख दल अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं?
जिस पार्टी को अपने “थिंक टैंक” और रणनीतिक क्षमता पर सबसे ज्यादा भरोसा है, उसी के संगठन अगर एक पारित कानून को “गिरा हुआ” बताकर विरोध कर रहे हैं, तो सवाल सिर्फ विपक्ष पर नहीं…अब सवाल खुद उस रणनीति पर भी उठने लगे हैं।

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